कौन थे फादर स्टेन स्वामी, जिनका नाम भीमा कोरेगांव केस में आया था? जानें- कैसा बीता उनका जीवन

एनआईए ने आरोप लगाया था कि स्टेन स्वामी प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के सदस्य हैं. यह आरोप भी कि स्‍टेन इसके मुखौटा संगठनों के संयोजक हैं तथा सक्रिय रूप से इसकी गतिविधियों में शामिल रहते

आ‍दिवासी और वंचितों के अधिकार के लिए मुखर रहने वाले और भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े मामले में आरोपी स्‍टेन स्‍वामी का सोमवार को निधन हो गया. मुंबई के होली फैमिली हॉस्पिटल में उन्होंने आखिरी सांस ली. स्‍टेन स्‍वामी की जमानत याचिका पर सोमवार को ही सुनवाई होनी थी. उनके निधन पर बहुत सारे लोगों ने शोक जताया है. विपक्ष के नेताओं ने केंद्र पर निशाना साधते हुए बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी को राष्‍ट्रीय अपमान और उनकी मौत को हत्या बताया है.84 साल के असहाय बुजुर्ग से भारत में किसको डर था? क्यों नहीं मिली थी बेल? जेल में बन्द मौत की जिम्मेवारी कौन तय करेगा? मालेगानव के आरोपित निर्दोष हो जाते हैं। कैसे सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले को सलाखों में बंद कर दिया जाता है या मौत की घाट उतार दिया जाता है।

अगर देखा जाए तो स्टेन स्वामी का पूरा जीवन सामाजिक गतिविधियों से भरा रहा है. स्टैनिस्लॉस लोर्दूस्वामी उर्फ फादर स्टेन स्वामी एक रोमन कैथोलिक पादरी थे, जिनका जीवन 1990 के दशक से ही झारखंड के आदिवासियों और वंचितों के अधिकारों के लिये काम करने के लिए पूरी तरह समर्पित रहा. 84 वर्षीय स्वामी को भीमा-कोरेगांव मामले में कथित संलिप्तता को लेकर एनआईए (NIA) ने गिरफ्तार किया था.

ब्रसेल्स में पढ़ाई के दौरान ब्राजील के आर्चबिशप से प्रभावित हुए

स्टेन स्वामी का जन्म 26 अप्रैल 1937 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुआ था. उनके मित्रों के अनुसार उन्होंने थियोलॉजी और मनीला विश्वविद्यालय से 1970 के दशक में समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की. बाद में उन्होंने ब्रसेल्स में भी पढ़ाई की, जहां उनकी दोस्ती आर्चबिशप होल्डर कामरा से हुई. ब्राजील के गरीबों के लिए उनके किए गए काम ने स्टेन स्वामी को खूब प्रभावित किया.

उन्होंने 1975 से 1986 तक बेंगलुरू स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के निदेशक के तौर पर काम किया. झारखंड में आदिवासियों के लिए एक कार्यकर्ता के रूप में करीब 30 साल पहले उन्होंने काम करना शुरू किया. उन्होंने जेलों में बंद आदिवासी युवाओं की रिहाई के लिये काम किया, जिन्हें अक्सर झूठे मामलों में फंसाया जाता था. इसके साथ ही उन्होंने हाशिये पर रहने वाले उन आदिवासियों के लिए भी काम किया, जिनकी जमीन का बांध, खदान और विकास के नाम पर बिना उनकी सहमति के अधिग्रहण कर लिया गया था.

आदिवासियों के लिए बनाया ‘बिरसा’ एनजीओ

स्टेन स्वामी के साथ आदिवासियों के अधिकारों के लिए बनाए गए गैर सरकारी संगठन ‘बिरसा’ में काम कर चुके चाईबासा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता दामू वानरा बताते हैं कि समाजशास्त्र से एमए करने के बाद कैथोलिक्स द्वारा चलाये जा रहे बेंगलुरू स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में निदेशक के तौर पर काम करने के दौरान ही स्टैन स्वामी झारखंड के चाईबासा आने लग. उन्होंने गरीबों तथा वंचितों के साथ रह कर उनके जीवन को नजदीक से देखने और समझने की कोशिश की.

रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा को दी गति

दामू ने बताया कि इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट से 1986 में सेवानिवृत्त होने के बाद स्टैन स्वामी चाईबासा में ही जाकर रहने लगे और वहां उन्होंने आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने के वास्ते ‘बिरसा’ नामक एनजीओ की स्थापना की. वहीं, मुख्य रूप से मिशनरी के सामाजिक कार्य के लिए ‘जोहार’ नामक एनजीओ का प्रारंभ किया.

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स्टेन स्वामी के साथ काम करने वाली अजीता जॉर्ज बताती हैं कि वर्ष 2003 तक तो स्टेन स्वामी चाईबासा के आदिवासियों और मिशनरियों के ही होकर रह गये, लेकिन उसके बाद वह रांची के नामकुम में जाकर रहने लगे और चाईबासा में कभी-कभी जाते थे.

दामू ने कहा, ‘‘पादरी होने के बावजूद स्टैन स्वामी कभी भी लोगों से दूर नहीं होते थे. उनसे कभी भी कोई भी जाकर मिल सकता था. स्वामी स्वयं चाईबासा के गांव-गांव से जुड़े हुए थे. बड़ी संख्या में वहां ऐसे गांव हैं, जहां लोग स्वामी को व्यक्तिगत तौर पर जानते थे.’’

विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन की शुरुआत

उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में स्वामी ने पादरी का काम किया लेकिन फिर आदिवासी अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगे. बतौर मानवाधिकार कार्यकर्ता झारखंड में विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन की भी स्थापना की. यह संगठन आदिवासियों और दलितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ता है.
फादर स्टेन स्वामी झारखंड आर्गेनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम रेडियेशन से भी जुड़े रहे, जिसने 1996 में यूरेनियम कॉरपोरेशन के खिलाफ आंदोलन चलाया था, जिसके बाद चाईबासा में बांध बनाने का काम रोक दिया गया.

चर्चा में रही ‘जेल में बंद कैदियों का सच’ किताब
वर्ष 2010 में फादर स्टैन स्वामी की ‘जेल में बंद कैदियों का सच’ नामक किताब प्रकाशित हुई, जिसमें यह उल्लेख किया गया था कि कैसे आदिवासी नौजवानों को नक्सली होने के झूठे आरोपों में जेल में डाला गया. उनके साथ काम करने वाली सिस्टर अनु ने बताया कि स्वामी गरीब आदिवासियों से जेल में भी मिलने जाते थे और 2014 में उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें कहा गया कि नक्सली होने के नाम पर हुई तीन हजार गिरफ्तारियों में से 97 प्रतिशत मामलों में आरोपी का नक्सल आंदोलन से कोई संबंध नहीं था. इसके बावजूद ये नौजवान जेल में बंद रहे. अपने अध्ययन में उन्होंने यह भी बताया कि झारखंड की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में 31 प्रतिशत आदिवासी हैं और उनमें भी अधिकतर गरीब आदिवासी.
गिरफ्तार
कहते थे- कानून हाथ में न लो… और फिर ऐसे हो गए गिरफ्तार
दामू वानरा ने बताया, “स्वामी लगातार कहते थे कि गरीबों, आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ो लेकिन कानून अपने हाथ में न लो, लेकिन वह स्वयं पहले खूंटी के पत्थलगड़ी आंदोलन में कानून अपने हाथ में लेने और आदिवासियों को भड़काने के मामलों में पुलिस प्राथमिकी में आरोपी बनाये गये और फिर भीमा कोरेगांव के एल्गार परिषद वाले मामले में भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया.’’

स्टेन स्वामी पर पत्थलगढ़ी आंदोलन के मुद्दे पर तनाव भड़काने के लिए झारखंड सरकार के खिलाफ बयान जारी करने के आरोप थे. झारखंड की खूंटी पुलिस ने स्टेन स्वामी समेत 20 लोगों पर राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया था.

माओवादी सदस्य होने के आरोप

एनआईए ने आरोप लगाया था कि स्टेन स्वामी प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के सदस्य हैं. एनआईए ने आरोप लगाया था कि वह इसके मुखौटा संगठनों के संयोजक हैं तथा सक्रिय रूप से इसकी गतिविधियों में शामिल रहते हैं. जांच एजेंसी ने उनपर संगठन का काम बढ़ाने के लिए एक सहयोगी के माध्यम से पैसे हासिल करने का आरोप लगाया था. वानरा ने अफसोस जताया कि आखिर स्वयं कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने के आरोप में जेल में बंद स्वामी का आज मुंबई में निधन हो गया, जिसका उन्हें सदा दुख रहेगा.
(Input: PTI/Bhasha)

प्रसिद्ध यादव।