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मातृ एवं शिशु मृत्यु को लेकर एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन, मातृ एवं शिशु मृत्यु की सर्विलांस और रिपोर्टिंग करना होगा मजबूत

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गर्भवती महिलाओं की जांच के समय स्टेथोस्कोप जरूर लगाएं: सिविल सर्जन
राज्य में मातृ मृत्यु के अनुपात में आयी हैं कमी: डॉ नलिनी कांत त्रिपाठी
मातृ मृत्यु को रोकने के लिए गर्भवती महिलाओं की देखभाल एवं गुणवत्ता में सुधार जरूरी: प्रशांत कुमार
मातृ मृत्यु की तरह शिशु मृत्यु की रिपोर्टिंग जरूरी: डीपीएम

पूर्णिया, 08 दिसंबर।
मातृ शिशु स्वास्थ्य को बेहतर एवं गुणवत्ता पूर्ण बनाने के लिए स्वास्थ्य विभाग एवं अन्य सहयोगी संस्थाओं द्वारा कई तरह के कार्यक्रम का आयोजन कर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने का प्रयास लगातार किया जा रहा है। मातृ एवं शिशु मृत्यु की सर्विलांस एवं रिपोर्टिंग को मजबूत करने के उद्देश्य से सदर अस्पताल के जिला प्रतिरक्षण कार्यालय के सभागार में एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें जिले के सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, बीएचएम और बीसीएम को प्रशिक्षण दिया गया। इस अवसर पर पटना से प्रशिक्षण देने आये यूनीसेफ की ओर से डॉ नलिनी कांत त्रिपाठी एवं पाथ की ओर से प्रशांत कुमार, सिविल सर्जन डॉ एसके वर्मा, जिला स्वास्थ्य समिति के जिला कार्यक्रम प्रबंधक ब्रजेश कुमार सिंह, जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ विनय मोहन, डीसीएम संजय कुमार दिनकर, केयर इंडिया के डीटीएल आलोक पटनायक सहित जिले के सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, बीएचएम और बीसीएम उपस्थित रहे।

गर्भवती महिलाओं की जांच के समय स्टेथोस्कोप जरूर लगाएं: सिविल सर्जन
सिविल सर्जन डॉ एसके वर्मा ने कहा गर्भवती महिलाओं को प्रत्येक तीन महीने के अंतराल पर प्रसव पूर्व जांच (एएनसी) सुरक्षित प्रसव के लिए बहुत ज्यादा जरूरी होता है। क्योंकि सुरक्षित प्रसव के लिए गर्भावस्था के दौरान जांच की प्रक्रिया को पूरा करना अतिआवश्यक होता हैं। आगे उन्होंने कहा गर्भवती महिलाओं की जांच करते समय स्टेथोस्कोप जरूर लगाएं। क्योंकि इस जांच से गर्भवती महिलाओं में कई तरह की बीमारियों को आसानी से पता लगाया जा सकता है। क्योंकि मातृ मृत्यु के एक प्रमुख कारण जॉन्डिस, चीनी रोग, हृदय रोग, खून की कमी आदि पूर्व से चली आ रही बीमारियों में से एक है। ज़िले के विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु विभिन्न कारणों से हो जाती है। लेकिन इसकी सही रिपोर्ट का होना भी जरूरी होता है। क्योंकि मृत्यु के कारणों को छुपा लिया जाता है। जिससे मृत्यु की सही जानकारी नहीं मिल पाती है। जिस कारण मातृ मृत्यु के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराते हुए उस पर कार्यवाई करनी पड़ती है। पिछले वर्ष की बात करें तो ज़िले में 57 मातृ मृत्यु एवं 175 शिशु मृत्यु की शिकायतें आयी हुई थी। जिसमें 25 प्रतिशत मामलें को समीक्षा की गयी है।

राज्य में मातृ मृत्यु के अनुपात में आयी हैं कमी: डॉ नलिनी कांत त्रिपाठी
यूनिसेफ की ओर से आये डॉ नलिनी कांत त्रिपाठी ने कहा राज्य में मातृ मृत्यु के अनुपात में पहले की अपेक्षा बहुत कमी आयी है। वर्ष 2004-06 में बिहार का मातृ मृत्यु अनुपात 312 से कम होकर 2020-21 में 149 (SRS-2016-18 अनुसार) हो गया है। यह गिरावट लगभग 52% का है। प्रत्येक वर्ष लगभग एक लाख जीवित बच्चों के अनुपात में 149 माताओं की मृत्यु केवल बिहार में होती है। जो कि लगभग 4779 है। प्रत्येक गर्भवती माता का सुरक्षित प्रसव कराकर एवं प्रसव पश्चात देखभाल सुनिश्चित कर के एमएमआर के अनुपात को 70 प्रति 100000 जीवित बच्चों से नीचे ले जाना 2030 तक लक्ष्य है। हालांकि मातृ मृत्यु दर में प्रतिवर्ष कम से कम 2% की कमी लानी है। इसके लिए विभाग की ओर से कई तरह के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। जिनमें मुख्य रूप से एएनसी, पीएनसी, सुमन, जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान शामिल हैं।

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मातृ मृत्यु को रोकने के लिए गर्भवती महिलाओं की देखभाल एवं गुणवत्ता में सुधार जरूरी: प्रशांत कुमार
पटना से आये पाथ के प्रतिनिधि प्रशांत कुमार ने प्रतिभागियों से कहा कि मातृ मृत्यु की समीक्षा करने और रिपोर्टिंग करने से अब काम चलने वाला नहीं है। इस विषय को लेकर राज्य सरकार पहले से ज्यादा गंभीर हो गई है। मातृ मृत्यु को कम करने के लिए अब एमडीएसआर यानी मैटरनल डेथ सर्विलांस एंड रिस्पांस की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इसको लेकर विस्तृत रूप से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा की यह मातृ मृत्यु की पहचान, जानकारी और समीक्षा करने का चक्र है। इसके माध्यम से गर्भवती महिलाओं की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार कर मातृ मृत्यु को रोका जा सकता है। हालांकि मातृ मृत्यु को परिभाषित करते हुए उन्होंने बताया यह केवल गर्भधारण से लेकर प्रसव के 42 दिन के अंदर हुई मृत्यु ही मातृ मृत्यु की परिभाषा नहीं है। बल्कि उस महिला की मृत्यु प्रसव से संबंधित जटिलताओं एवं उसके प्रबंधन में चूक से हुई है या नहीं।

मातृ मृत्यु की तरह शिशु मृत्यु की रिपोर्टिंग जरूरी: डीपीएम
जिला स्वास्थ्य समिति के डीपीएम ब्रजेश कुमार सिंह ने बताया
नवजात शिशुओं की मृत्यु के होने के मुख्यतः तीन मुख्य कारण सामने आते हैं। जिनमें सबसे पहला, समय के पूर्व शिशु का जन्म होना, दूसरा, एस्फ़िक्सिया यानि सांस का नही लेना, जबकिं तीसरा, इंफ़ेक्शन जैसे: सैप्सिज़ और निमोनिया के कारण नवजात शिशुओं की मृत्यु जन्म के बाद हो जाती है। आशा कार्यकर्ताओं के द्वारा मातृ एवं शिशु मृत्यु की सूचना देने के एवज में प्रोत्साहन राशि भी दी जाती हैं। मातृ मृत्यु की तरह ही शिशु मृत्यु की सही तरीके से रिपोर्टिंग हो। इसके लिए स्थानीय पीएचसी स्तर से लेकर जिला स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा शत प्रतिशत रिपोर्टिंग होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि हम लोगों द्वारा कितना प्रयास किया गया है।

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